Friday, June 15, 2007

बशीर बद्र साहब...

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
ना
जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये !


कोई हाथ ना मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिल करो!


दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,
जब कभी हम दोस्त हो जाये तो शर्मिंदा ना हो !


हम तो दरिया है हमे अपना हुनर मालूम है,
हम जहाँ से जायेगे , वो रास्ता हो जाएगा !


मुसाफिर है हम भी मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी!


जिन्दगी तुने मुझे कब्र से कम दीं है ज़मीं
पाँव फैलाओं तो दीवार में सर लगता उस!


जाने उस जाने जाने उस आऊंगा ,
ज़िन्दगी मुझको तेरा पता चाहिऐ !


मैं एक लम्हे में सदियाँ देखता हूँ,
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है!


समंदर को समझना है तो उसकी तह में टहलाकर
यह साहिल है, यहाँ तो मछलियाँ कपडे बदला करती हैं !


चाहते तो किसी पत्थर कि तरह जी लेते ,
हमने खुद मॉम की मानिंद पिघलना चाहा !

1 comment:

Anita kumar said...

क्या शेर कहे हैं बशीर बद्र साहब ने। इन्हें यहां पढ़वाने के लिए धन्यवाद