ग़ालिब इश्क ने निकम्मा कर दिया,
आदमी थे हम भी काम के !
ग़ालिब इश्क तो एक आदमी को मारता है,
हमे क्या बुरा था मरना ग़र एक बार होता !
या रब वो जो समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात को,
दे उन्हें कुछ और दिल ग़र दे ना मुझे ज़ुबां और !
कितने शीरी है तेरे लब के रकीब,
गालियाँ खा कर भी बे-मज़ा ना हुआ !
वो पूछते है कि ग़ालिब क्या है,
कोई हमे बतलाए कि हम बतलाये क्या !
हर बात पे कहते हो के तू क्या है
कोई बतलाये कि ये अंदाज़ -ए- गुफत्गु क्या है,
रगो में दौड़ते फिरने के हम नही कायल
जब आंख ही से ना टपका तो लहू क्या है !
मुजोवर खुल के कभी माँ के सामने रोना नही,
क्योंकि जहाँ नीव हो, वहाँ नमी अच़छी नही !
Thursday, June 14, 2007
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