उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
ना जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये !
कोई हाथ ना मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिल करो!
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,
जब कभी हम दोस्त हो जाये तो शर्मिंदा ना हो !
हम तो दरिया है हमे अपना हुनर मालूम है,
हम जहाँ से जायेगे , वो रास्ता हो जाएगा !
मुसाफिर है हम भी मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी!
जिन्दगी तुने मुझे कब्र से कम दीं है ज़मीं
पाँव फैलाओं तो दीवार में सर लगता उस!
जाने उस जाने जाने उस आऊंगा ,
ज़िन्दगी मुझको तेरा पता चाहिऐ !
मैं एक लम्हे में सदियाँ देखता हूँ,
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है!
समंदर को समझना है तो उसकी तह में टहलाकर
यह साहिल है, यहाँ तो मछलियाँ कपडे बदला करती हैं !
चाहते तो किसी पत्थर कि तरह जी लेते ,
हमने खुद मॉम की मानिंद पिघलना चाहा !
Friday, June 15, 2007
Thursday, June 14, 2007
चचा ग़ालिब...
ग़ालिब इश्क ने निकम्मा कर दिया,
आदमी थे हम भी काम के !
ग़ालिब इश्क तो एक आदमी को मारता है,
हमे क्या बुरा था मरना ग़र एक बार होता !
या रब वो जो समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात को,
दे उन्हें कुछ और दिल ग़र दे ना मुझे ज़ुबां और !
कितने शीरी है तेरे लब के रकीब,
गालियाँ खा कर भी बे-मज़ा ना हुआ !
वो पूछते है कि ग़ालिब क्या है,
कोई हमे बतलाए कि हम बतलाये क्या !
हर बात पे कहते हो के तू क्या है
कोई बतलाये कि ये अंदाज़ -ए- गुफत्गु क्या है,
रगो में दौड़ते फिरने के हम नही कायल
जब आंख ही से ना टपका तो लहू क्या है !
मुजोवर खुल के कभी माँ के सामने रोना नही,
क्योंकि जहाँ नीव हो, वहाँ नमी अच़छी नही !
आदमी थे हम भी काम के !
ग़ालिब इश्क तो एक आदमी को मारता है,
हमे क्या बुरा था मरना ग़र एक बार होता !
या रब वो जो समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात को,
दे उन्हें कुछ और दिल ग़र दे ना मुझे ज़ुबां और !
कितने शीरी है तेरे लब के रकीब,
गालियाँ खा कर भी बे-मज़ा ना हुआ !
वो पूछते है कि ग़ालिब क्या है,
कोई हमे बतलाए कि हम बतलाये क्या !
हर बात पे कहते हो के तू क्या है
कोई बतलाये कि ये अंदाज़ -ए- गुफत्गु क्या है,
रगो में दौड़ते फिरने के हम नही कायल
जब आंख ही से ना टपका तो लहू क्या है !
मुजोवर खुल के कभी माँ के सामने रोना नही,
क्योंकि जहाँ नीव हो, वहाँ नमी अच़छी नही !
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